मंगलवार 16 जून 2026 - 08:48
मजलिस-ए-हुसैनी को प्रतिरोधी संस्कृति के प्रसार का केंद्र बनाया जाए / इस वर्ष का मुहर्रम विशिष्ट विशेषताओं का धनी है

मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी की उच्च परिषद के सदस्य ने वर्तमान संवेदनशील परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि मजलिस-ए-हुसैनी को केवल ज्ञानात्मक और आस्थात्मक पहलुओं तक सीमित न रखते हुए प्रतिरोध, त्याग की संस्कृति को बढ़ावा देने, शहीदों की स्मृति को जीवित रखने और जागरूक एवं समर्पित उम्मत की सराहना के केंद्रों में परिवर्तित किया जाना चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के प्रतिनिधि से बातचीत में मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी की उच्च परिषद के सदस्य तथा तेहरान के इमाम-ए-जुमा आयतुल्लाह सैयद अहमद खातमी ने वर्तमान संवेदनशील परिस्थितियों में मजलिस-ए-हुसैनी को प्रतिरोध, त्याग और शहीदों की स्मृति को जीवित रखने के केंद्र बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने हौज़ात-ए-इल्मिया के दो मूलभूत दायित्वों “तफ़क्कोह फ़िद्दीन” (धर्म की गहन समझ) और “तबलीग़ व हिदायत” (धर्म-प्रचार और मार्गदर्शन) का उल्लेख करते हुए कहा कि मुहर्रम और सफ़र के महीने धार्मिक शिक्षाओं को जनता के दिलों से जोड़ने और आशूरा के संदेश को स्पष्ट करने का सर्वोत्तम अवसर हैं।

आयतुल्लाह खातमी ने कहा कि पूरे देश में उपलब्ध धार्मिक प्रचार के अवसरों का अध्ययन करके एक व्यवस्थित डाटा बेस तैयार किया जाना चाहिए, ताकि प्रचारकों को प्रत्येक क्षेत्र की आवश्यकताओं और समस्याओं की जानकारी मिल सके।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष का मुहर्रम कम-से-कम पिछले पचास वर्षों की तुलना में निम्नलिखित अभूतपूर्व विशेषताएँ रखता है:

  1. जनता का उत्साहपूर्ण और हुसैनी समागम:
    इन जनसभाओं को सौ से अधिक रातें बीत चुकी हैं, फिर भी लोग सड़कों पर मौजूद हैं। उनकी यह उपस्थिति केवल एक सामाजिक या राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि आशूरा की प्रेरणा और संस्कृति की अभिव्यक्ति है।
  2. “कुल्लु यौमिन आशूरा व कुल्लु अरदिन कर्बला” की संस्कृति का स्पष्टीकरण:
    हज़रत इमाम खुमैनी (रह.) ने इस सिद्धांत को स्पष्ट किया कि आशूरा केवल एक दिन और कर्बला केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली व्यवस्था और संस्कृति है। प्रचारकों को इस वास्तविकता को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए।
  3. शहीदों का सम्मान और शहादत की संस्कृति:
    उन्होंने पैग़म्बर-ए-अकरम (स.) की जीवन-शैली का उल्लेख करते हुए कहा कि शहीदों को भुलाया नहीं जाना चाहिए। मजलिस-ए-हुसैनी में पवित्र रक्षा (दिफ़ा-ए-मुकद्दस) और हालिया युद्धों के शहीदों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए तथा उनकी कुर्बानियों को सम्मान दिया जाना चाहिए।
  4. आशूरा आंदोलन का विश्लेषण:
    उन्होंने इमाम खुमैनी (रह.) और रहबर-ए-इंक़िलाब के आशूरा संबंधी विश्लेषणों को सर्वोत्तम उदाहरण बताया।

उन्होंने आगे कहा कि इमाम खुमैनी (रह.) ने यह सिद्ध किया कि “मुहर्रम वह महीना है जिसमें रक्त की तलवार पर विजय होती है”, जबकि इमाम ख़ामेनेई ने “इबरतहाए आशूरा” (आशूरा से मिलने वाली शिक्षाएँ) जैसे विषयों के माध्यम से इस आंदोलन के नए आयामों को प्रस्तुत किया।

आयतुल्लाह खातमी ने प्रचारकों को संबोधित करते हुए कहा कि वे इमाम खुमैनी (रह.) के इन विचारों का उपयोग करके आशूरा आंदोलन की व्याख्या करें और लोगों को यह समझाएँ कि आज भी उनका मैदान में उपस्थित रहना और अत्याचारियों के मुकाबले में डटे रहना हज़रत सैय्यदुश्शुहदा इमाम हुसैन (अ.) के मार्ग की निरंतरता है।

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